देश की ही नहीं अपराध की भी राजधानी है दिल्ली

देश की ही नहीं अपराध की भी राजधानी है दिल्ली

 

दिल्ली

शून्य अपराध के लिए देश विदेश में इस कद्र बदनाम हो चुकी है कि इसे अब देश की नहीं, अपराध की राजधानी कहकर पुकारा जाने लगा है। पहले ये महिलाओं के प्रति अपराध को लेकर लखनऊ और जयपुर से ही आगे थी अब ये महिलाओं के लिए असुरक्षित माने जाते देश के 19 मैट्रो शहरों को मात दे रही है। हैरानी तो इस बात की है कि दिल्ली के लेफ्टीनें टगवर्नर महोदय, जिनकी देखरेख में दिल्ली पुलिस काम करती है इस बात से कत्तई विचलित नहीं लगते कि ऐसा हो क्यों रहा है ?

देश के अपराध का लेखा जोखा रखने वाले नेशनल क्राईम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी)के ताज़ा तरीन आंकड़े देश को हिला देने वाला खुलासा करते  हैं, लेकिन न तो दिल्ली पुलिस और न ही प्रशासक यानि एलजी साहिब को इससे कोई फर्क पड़ता नज़र आ रहा है। ऐसा इसलिए भी लगता है कि आपराधिक मामलों के आंकड़े सामने आ जाने के बाद न तो एलजी साहिब ने ही कोई नया आदेश जारी किया और न ही पुलिस ने अपने तौर पर कोई एक्शन प्लॉन ही लोगों के सामने रखा कि भले ही अपराध पर काबू न पाया जा सके कम से कम इसमें कमी तो लाई जाए।

गत वर्ष के अंत में एनआरसीबी की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक देश के जो 19 असुरक्षित मैट्रो शहर हैं उनमें दिल्ली सर्वोपरि है। यहां महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराध कम होने की बजाए हर साल बढ़ते ही जा रहे हैं। जब आम आदमी पार्टी सरकार लेफ्टीनेंट  गवर्नर साहिब का ध्यान इस ओर खींचना चाहती है तो जांच की मांग को फाइलों में ही उलझा कर रख दिया जाता है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि एलजी साहिब के पास जो अपार शक्तियां  हैं तो क्या  वो लोगों को दिखाने के लिए हैं या फिर उनका प्रयोग करके जनता का कोई भला भी किया जा सकता है ?

अपराध जगत में सबसे बड़ा अपराध होता है किसी की हत्या कर देना। यदि देश भर के मैट्रो सिटीज़ में 2016 में 2194 हत्याएं हुईं तो इनमें से अकेले दिल्ली में ही 479 हुईं जोकि कुल आंकड़ों का 21.8 फीसदी बनता है। न सिर्फ महिलाओं बल्कि बच्चों के प्रति अपराध को लेकर भी दिल्ली सारे देश की सरपरस्ती करता नज़र आता है। ज्ञात हो कि अपराध के आंकड़े साल बीत जाने पर ही जारी किए जाते हैं। वर्ष 2016 के आंकड़े 2017 के अंत में जारी किए गए हैं जबकि 2017 के आंकड़े आने अभी बाकी हैं।

आंकड़े बताते हैं कि अपराध के मामले में दिल्ली ने बेंगलुरू और मुंबई को भी पछाड़ दिया है। कम उम्र के बालक जिस तरह से अपराध जगत में उभर कर सामने आ रहे हैं उससे तो दिल्ली की छवि और भी खराब हो रही है लेकिन दिल्ली पुलिस को इसकी परवाह कहां है। गत वर्ष दिल्ली में ऐसे 2368 मामले सामने आए जो कि बहुत ही शर्मनाक हैं। नाबालिग बच्चों ने देशभर में जितने भी अपराध किए हैं अकेली दिल्ली में ही उसके38.8 फीसदी मामले सामने आए हैं। अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यौवन की दहलीज पर खड़े बालक किस कदर अपराधों में संलिप्त हैं। आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में अपहरण और फिरौती के ही कुल 5453 मामले सामने आए थे जो कि देश भर में सबसे बड़ा आंकड़ा है। ये देश के ऐसे कुल अपराधों का 48.3 फीसदी बैठता है। इसपर भी पुलिस के सरदार एलजी साहिब की कोई जिम्मेवारी तय नहीं की जा रही।


बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाली केंद्र सरकार भी दिल्ली में ही बैठी है और उनके प्रतिनिधि के तौर पर दिल्ली के एलजी साहिब पुलिस के सर्वेसर्वा हैं। देश के लोग कहते हुए शर्म महसूस करते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में भी दिल्ली देश में नंबर वन है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे जो 41761 मामले प्रकाश में आए जिनमें से से अकेली दिल्ली के ही  13803 मामले हैं। कहा जा सकता है कि ऐसे कुल मामलों का 33.0 फीसदी तो राजधानी की ही देन है। बलात्कार के कुल मामलों का 40 फीसदी दिल्ली में ही घटा जबकि पतियों द्वारा अत्याचार के कुल मामलों में से 29 फीसदी सिर्फ दिल्ली में ही हुए, वही दिल्ली जहां के लोग पढ़े लिखे और अग्रणी सोच के मालिक माने जाते हैं।

ज्य़ादा देर पुरानी बात नहीं, ये आंकड़े वर्ष 2016 के हैं। एनसीआरबी ने आपराधिक घटनाओं के आंकड़े जारी करते हुए कहा गया कि दिल्ली अपराध के मामले में लखनऊ और जयपुर को भी पीछे छोड़ आया है। सिर्फ महिलाओं के प्रति अपराध को ही लें तो वहां यदि 2014 के मुकाबले 2016 में 19.6 फीसदी का इज़ाफा हुआ। क्या ये निंदनीय नहीं? अपराध पर काबू पाना एलजी साहिब की संवैधानिक जिम्मेवारी है जिससे कहीं न कहीं वो भागते नज़र आते हैं।

एनसीआरबी के मुताबिक मैट्रोपॉलिटन सिटी दिल्ली में  2016 में प्रति एक लाख की आबादी पर औसतन 182.1 अपराधिक मामले दर्ज किए गए। ये एक हैरानीजनक तथ्य था। वो भी तब जबकि लखनऊ और जयपुर जैसे बड़े शहरों में महिलाओं के प्रति अपराध में कमी दर्ज की गई। भले ही ये कमी आंशिक थी, फिर भी राजधानी दिल्ली में अपराध का बढऩा सारे देश को शर्मसार करता है।यहां ये भी ध्यान देने योग्य है कि मैट्रोपॉलिटन सिटीज़ के अतिरिक्त राज्यों की बात करें तो भी दिल्ली में महिलाओं के प्रति क्राइम सिर चढक़र बोलता है।

दिल्ली के उपराज्यपाल की सबसे बड़ी जिम्मेवारी पुलिस को माकूल आदेश देना होता है। कहा जा सकता है कि अपराध को रोकने की सीधी जिम्मेवारी निभा रहे दिल्ली पुलिस और एलजी के बीच कहीं कोई समन्यवय नहीं है। हां ये बात अलग कि उप राज्यपाल अपने भाषणों में दिल्ली में पुलिस की संख्य कम होने का जि़क्र अक्सर करते हैं परंतु ये बात दिल्ली वासियों की समझ से परे है दिल्ली पुलिस में बहुत से पद रिक्त पड़े हैं और इन्हें भरने के लिए न सिर्फ केजरीवाल सरकार कई बार कह चुकी है बल्कि दिल्ली हाइकोर्ट भी एलजी को लताड़ लगा चुका है, इसके बावजूद भर्तियां नहीं हो रहीं। करीब 14000 कांस्टेबल्स की कमी से जूझ रही दिल्ली के अपराध में कमी होती नज़र नहीं आती।

दिल्ली में एक और तरह का अपराध पनप रहा है जिसे लापरवाही या भ्रष्टाचार के रुप में देखा जा रहा है। केजरीवाल सरकार जानती है कि प्रशासन को सुचारू रुप में चलाने के लिए कर्मचारियों की नई भर्तियां होना लाजि़मी है। अब दिल्ली सरकार सर्विसिज़ के नाम पर इसलिए कुछ नहीं कर पाती क्योंकि नई भर्तियों अधिकार दिल्ली  सरकार के पास नहीं है। एक आदेश के मुताबिक ये अधिकार एलजी को दिया जा चुका है। सरकार के बार-बार किए गए अनुरोध को एलजी दरकिनार करते हुए 37000 कर्मचारियों की नियुक्तियों पर खामोश बैठे हैं।

ऐसे में सरकार का काम तो बाधित हो ही रहा है साथ ही काम करवाने के लिए लोग भ्रष्टाचार का सहारा ले रहे हैं जिससे एक नए अपराध की प्रवृति भी पनप रही है। अब तो उपराज्यपाल ने यहां तक आदेश दे दिए हैं कि नियुक्तियों की कोई भी फाइल सरकार, यहां तक कि किसी मंत्री को भी न दिखाई जाए, ऐसे प्रतीत होता है मानो दिल्ली में एलजी की नियुक्ति केवल प्रशासनिक कार्यों में बाधा पहुँचाने के लिए की गई है.

 

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