गुजरात में राजदीप के साथ घटी घटना को अपने नाम से जोडकर...

गुजरात में राजदीप के साथ घटी घटना को अपने नाम से जोडकर गढ़ी कथा

भाजपा हितैषी पत्रकार अर्णब गोस्वामी ने मारी जीवन की सबसे बड़ी गप्पसोशल मीडिया पर भारी विरोध दर्ज, राष्ट्र जानना चाहता है उसने झूठ यों बोला

पत्रकार समाज का एक जागरूक प्राणी होता है और उससे ये उमीद कभी नहीं की जाती कि वो किसी जाति बिरादरी या धर्म में उलझकर अपनी पत्रकारिता को एक ऐसी दिशा दे दे जिससे उसके किसी पार्टी या सरकार के हितैषी होने की बू आने लगे। लगता है कि ये तो अब बीते की बात हो गई है।

आज ज्य़ादातर पत्रकार सरकारों से निकटता बनाकर अपने हित साधने में लगे हुए हैं। टीवी चैनलों पर तो ऐसे पत्रकारों की पहचान भी हो चुकी है जो समाज के नहीं बल्कि किसी पार्टी विशेष या फिर किसी समुदाय विशेष के झंडाबरदार बने हुए हैं। ये बड़े पत्रकार जब झूठ बोलने पर आते हैं तो वो भी इतना बड़ा होता है कि जल्द ही पकड़ में नहीं आता।

आज ज्य़ादातर पत्रकार सरकारों से निकटता बनाकर अपने हित साधने में लगे हुए हैं। टीवी चैनलों पर तो ऐसे पत्रकारों की पहचान भी हो चुकी है जो समाज के नहीं बल्कि किसी पार्टी विशेष या फिर किसी समुदाय विशेष के झंडाबरदार बने हुए हैं। ये बड़े पत्रकार जब झूठ बोलने पर आते हैं तो वो भी इतना बड़ा होता है कि जल्द ही पकड़ में नहीं आता। ये ज़रूरी है कि सत्ताधारी पार्टी से निकटता बनाने के लिए झूठ ही बोला जाए जैसा कि रिपब्लिक चैनल प्रमुख अर्णब गोस्वामी ने किया, बरसों बाद सामने आए उनके एक झूठ को लेकर सोशल मीडिया पर आजकल चर्चा खूब हो रही है।

2002 के नरोडा गाम के दंगों के मामले में अमित शाह की कोर्ट में पेशी के बाद की अर्णब गोस्वामी की ऐसी वीडियो जगजाहिर हुई है जिसे देखकर हर कोई दंग रह जाता है। पहले इसे सोशल मीडिया से हटा दिया गया था लेकिन प्रतीक सिन्हा नाम के एक पत्रकार ने अपनी वेबसाईट आल्ट न्यूज़ पर इसे फिर से लोड कर दिया है। इसमें अर्णब गोस्वामी एक ऐसी घटना का जि़क्र कर रहे हैं जो असल में उनके साथ घटी ही नहीं। घटना 2002 के गुजऱात दंगों के बाद की बताई जाती है। राजदीप सरदेसाई की एक पोस्ट ने अर्णब के झूठ का भांडा फोड़ दिया है लेकिन पहले ये देखें कि उन्होंने वीडियो में कहा 1या। वो कहते हैं-

मैं आपसे जीवन की वो सच्चाई साझी करना चाहता हूं जिससे मैं गुजऱा हूं। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की कोठी से मात्र 50 मीटर दूर गए होंगे कि त्रिशूल लिए बहुत से लोगों ने हमारी एंबेसेडर कार रोकी, शीशे तोड़ दिए, गाड़ी पर भी त्रिशूल से कई वार किए, हमसे पूछा गया कौन हो, हमने कहा, पत्रकार हैं, नहीं ये नहीं बताओ कि तुम्हारा धर्म क्या है? शुक्र है भगवान का कि हममें से कोई भी अल्पसं2यक नहीं था। हमारे पास आइडेंटिटी कार्ड, प्रेस कार्ड थे लेकिन ड्राइवर के पास ऐसा कुछ नहीं था, मैं आदतानुसार आगे की सीट पर था। ड्राइवर के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं, उसके हाथ पर हे राम अंकित था, हम धर्मनिर्पेक्षता की बात करते हैं लेकिन मैंने इसे बहुत करीब से देखा है, हम किसी तरह वहां से बचकर आ गए लेकिन मुझे आज भी याद है कि हम कितना डर गऐ थे।

विचित्र बात है। जो घटना राजदीप सरदेसाई के साथ घटी उसमें स्वयं को फिट करके अर्णव आखिर सिद्ध कया करना चाहते हैं? सब जानते हैं कि वो भारतीय जनता पार्टी के प्रवकता की तरह काम करते हैं, तो फिर ये बताने की या ज़रूरत थी कि वो गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्री रहते भी उनके घर आया जाया करते थे। ये तो राजदीप की मेल ने खुलासा कर दिया अन्यथा देश कभी जान नहीं पाता कि कैसे एक पत्रकार इतना बड़ा झूठ बोल सकता है।

ऐसा भी नहीं है कि अर्णव ने झूठ का सहारा पहली बार लिया हो, अपने पहले चैनल के कार्यकाल के दौरान भी उनपर ऐसे ही आरोप लगते आए हैं लेकिन उन्हें किसी दूसरे पत्रकार ने सामने आकर अनुमोदित नहीं किया। हालांकि एक दो बार एनडीटीवी के रविश कुमार ने ज़रूर सोशल मीडिया पर अर्णव की कार्यशैली और उनकी अखबरों की सत्यता पर सवाल उठाए लेकिन सत्तापक्ष से जुड़े होने के कारण वो किसी तरह की कार्यवाही से बचते रहे।

अब ये भी जान लें कि राजदीप ने सोशल मीडिया पर एक के बाद एक, तीन बार लिखा। वे कहते हैं कि जिस कार का जि़क्र अर्णब कर रहे हैं उसमें अर्णब नहीं बल्कि वो (राजदीप)स्वयं थे जिसके बारे उन्होंने अपनी किताब- 2014: द इलेशन दैट चेंज्ड़ इंडिया-में जि़क्र किया है। उन्होंने दो तीन बार टवीट् करके उन पत्रकारों का भी जि़क्र किया जो उस व1त गुजऱात में थे।

वे कहते हैं कि अर्णब को तो उस एरिया में भेजा ही नहीं गया था। एनडीटीवी के एक पत्रकार संजीव सिंह जो कि उस समय दंगों की कवरेज़ कर रहे थे ने भी सिन्हा की वैबसाईट आल्ट न्यूज़ को बताया कि राजदीप गोधरा में गाड़ी जलाए जाने पर नरेंद्र मोदी का बयान लेने गए थे लेकिन जब पांच व्य1ितयों का टोला कार से आ रहा था तो इन पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया था। उन्होंने तो यहां तक कहा कि अर्णब तो बाद में आया था और उसे जि़ला खेड़ा में भेजा गया था न कि मोदी के निवास पर। उस वक्त साथ रहे कैमरामैन ने भी यही कहा है कि ये घटना अर्णब के साथ नहीं बल्कि राजदीप के साथ घटी थी।

अब ये भी जान लें कि राजदीप ने सोशल मीडिया पर एक के बाद एक, तीन बार लिखा। वे कहते हैं कि जिस कार का जि़क्र अर्णब कर रहे हैं उसमें अर्णब नहीं बल्कि वो (राजदीप)स्वयं थे जिसके बारे उन्होंने अपनी किताब- 2014: द इलेशन दैट चेंज्ड़ इंडिया-में जि़क्र किया है। उन्होंने दो तीन बार टवीट् करके उन पत्रकारों का भी जि़क्र किया जो उस वार गुजऱात में थे।

अब सोशल मीडिया अर्णब के खिलाफ सरगर्म हो उठा है। कोई उसे गप्पबाज कह रहा है तो कोई ड्रामेबाज़। लोग कह रहे हैं- देश जानना चाहता है कि अर्णब ने गप्पें यों  मारी। एक व्य1ित ने टवीट् किया है- हम तो समझ रहे थे कि वो बदल गया होगा, वो लोगों को बेवकूफ बना रहा है, हमेशा मुस्लमानों और अन्य अल्पसंयकों को निशाना बनाता है, भाजपा के खिलाफ कभी एक लफज़ नहीं बोलता, वो भाजपा का एजेंट है, गौरी लंकेश की मौत के बाद जो उसने कहा उससे उसकी पोल खुल गई है कि वो वास्तव में है एक या एक लोग जो सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं उसमें से अधिकतर को यहां नहीं लिखा जा सकता लेकिन एक बात तय है कि किसी पार्टी विशेष के कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले पत्रकार का हश्र कुछ ऐसा ही होता है। यदि पाठकों में विश्वसनीयता खो चुकी हो तो फिर सत्तापक्ष से जुड़े रहकर भी कुछ हासिल नहीं होता।

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